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भीमा कोरेगांव हिंसा की न्यायिक जांच कर रहे आयोग को एक और एक्सटेंशन मिला।

महाराष्ट्र सरकार ने भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच कर रहे न्यायिक आयोग को एक बार और 31 दिसंबर 2021 तक के लिए बढ़ा दिया।

आयोग का गठन फरवरी 2018 में किया गया था और उसे हिंसा के कारणों का पता लगाना था।

आयोग को छह महीने में एक निर्णायक रिपोर्ट सौंपनी थी। आयोग को अब तक 6 एक्सटेंशन दिया गया है।

महाराष्ट्र सरकार ने लॉकडाउन से पहले आयोग को लास्ट एक्सटेंशन देते हुए स्पष्ट किया कि यह आयोग को दिया गया अंतिम एक्सटेंशन होगा और आयोग को दिए गए इस अंतिम समय दरमियान अपनी जांच समाप्त करनी होगी।

लेकिन उसके बाद मार्च 2020 में पहला लॉकडाउन लगाया गया।

आयोग को इस बार आठवीं बाहर समय प्रदान किया गया है इसके पहले तो बार आयोग को लॉकडाउन के कारण समय प्रदान किया गया था।

आयोग ने अपनी पिछली सुनवाई के दौरान कहा कि जिस किसी को भी उन कारणों के बारे में कोई जानकारी है।

जिसके कारण हिंसा हुई या वह आयोग को किसी भी जानकारी के साथ मदद कर सकता है, आयोग द्वारा उनका बयान दर्ज करने के लिए बुलाया जाएगा।

दरअसल, लॉकडाउन से पहले आयोग ने एनसीपी प्रमुख शरद पवार से अपना बयान दर्ज करने को कहा था।

अब आयोग पुणे में इस पहले चरण की जांच करेगा। पुणे स्थित पार्टियों के बयान पुणे में दर्ज किए जाएंगे। और फिर पूछताछ का अगला चरण मुंबई में होगा।

तब शरद पवार का बयान दर्ज किए जाने की संभावना है।

दरअसल, लॉकडाउन से पहले अपनी आखिरी सुनवाई के दौरान आयोग ने यह भी कहा कि महाराष्ट्र के पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस का बयान भी दर्ज किया जाएगा क्योंकि वह हिंसा के समय राज्य प्रमुख थे।

1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव युद्ध की 200वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में हिंसा भड़क उठी।

स्मारक के दलित प्रतिभागियों पर कथित तौर पर भीड़ ने हमला किया था।

दंगों में एक व्यक्ति की जान चली गई। उसके बाद 2 और 3 जनवरी 2018 को पूरे महाराष्ट्र में दलितों ने आंदोलन किया और कुछ प्रदर्शन हिंसक भी हो गए।

2 जनवरी को, संभाजी भिड़े (शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान के प्रमुख) और मिलिंद एकबोटे (संस्था हिंदू अघाड़ी) के खिलाफ एक शून्य प्राथमिकी दर्ज की गई थी। एकबोटे और संभाजी पर हिंसा और दंगा भड़काने का आरोप लगा था।

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