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पूर्व CJI गोगोई पर यौन शोषण का आरोप लगाने के बाद #Pegasus के लिस्ट में शामिल थीं पीड़िता

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देश के पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर यौन शोषण के आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला का भी डाटा लीक हुआ। द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, इस स्टाफ के तीन फोन नंबर पर निगरानी रखी गई थी। इसके लिए अज्ञात भारतीय एजेंसी ने इजरायली स्पाइवेयर पेगासस का इस्तेमाल किया था।पेगासस बनाने वाले कंपनी NSO ग्रुप के संभावित ग्राहकों की लिस्ट में इस भारतीय एजेंसी का नाम है।
 

कोर्ट की स्टाफ को 2018 में नौकरी से निकाला

अपनी पहचान जाहिर ना करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कर्मचारी ने आरोप लगाया था कि साल 2018 में CJI गोगोई द्वारा उनका यौन उत्पीड़न किया गया था. इस घटना के कुछ हफ़्तों बाद ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. अप्रैल 2019 में उन्होंने एक हलफनामे में अपना बयान दर्ज कर सर्वोच्च अदालत के 22 जजों को भेजा था. 

CJI पर आरोप लगाने के बाद बनी टारगेट
फ्रांसीसी मीडिया ने कहा है कि CJI पर आरोप लगाने के बाद ही इस स्टाफ को टारगेट की लिस्ट में शामिल कर लिया गया था। जो लीक रिकॉर्ड फ्रांसीसी मीडिया के पास हैं, उनके मुताबिक महिला से जुड़े 3 नंबरों के अलावा उसके पति और दो देवर के 8 नंबरों को भी मार्क किया गया था। इन नंबरों को भी उसी हफ्ते सर्विलांस के लिए संभावित कैंडिडेट्स में शामिल किया गया था।

महिला से जुड़े 11 नंबर जासूसी प्रोजेक्ट में शामिल
रिपोर्ट के मुताबिक, महिला स्टाफ से जुड़े 11 नंबर पेगासिस के जासूसी के प्रोजेक्ट में शामिल किए गए थे। भारत में ये किसी एक मामले से जुड़े सबसे ज्यादा नंबर थे। जासूसी की लिस्ट में महिला स्टाफ का शामिल होना और उसे चुने जाने का वक्त बताता है कि उसे और उसके परिवार वालों को लिस्ट में इसलिए शामिल किया गया, क्योंकि उसने सार्वजनिक तौर पर भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस के खिलाफ बेहद गंभीर आरोप लगाए थे। इससे ये भी साबित होता है कि अनुचित रूप से दखल देना और गलत तरीके से निगरानी रखना ऐसे हालात में काफी रूटीन हो चला था, जबकि ऐसी कोई पब्लिक इमरजेंसी या भी नेशनल सिक्युरिटी का खतरा भी नहीं मौजूद था।

पीड़ित महिला का आरोप 

अपने बयान में पीड़ित महिला  ने दावा किया था कि जस्टिस गोगोई ने कथित तौर पर कुछ एहसानों के बदले उनके साथ शारीरिक तौर पर अंतरंग होने का प्रयास किया था. महिला का यह भी दावा था कि इससे इनकार करने के कुछ ही हफ्तों में उनका तीन बार ट्रांसफर किया गया, कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना करना पड़ा और आखिरकार उन्हें नौकरी से निकाल  दिया गया.

उनके एक देवर, जिन्हें CJI  के कोर्ट में नियुक्त किया गया था, को भी बिना किसी स्पष्टीकरण के काम से हटा दिया गया.

हालांकि उनकी तकलीफ़ यहीं ख़त्म नहीं हुआ. अपने बयान में महिला ने दावा किया कि इस घटना के तुरंत बाद दिल्ली  पुलिस में उनके पति और देवर को कथित रूप से झूठे आरोपों में विभागीय जांच का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उन्हें भी नौकरी से निकाल दिया गया. महिला अनुसार, लगभग उसी समय उनके खिलाफ रिश्वतखोरी का एक आपराधिक मामला एक ऐसे व्यक्ति द्वारा दायर किया गया था, जिससे वह कभी नहीं मिली थीं और बाद में इसी मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया.

उनका आरोप था कि हिरासत के दौरान उन्हें पुलिसकर्मियों द्वारा प्रताड़ित किया गया था, जो CJI  के कार्यालय से हटाए जाने के बाद से उनके परिवार पर भी नजर रख रहे थे.

उस समय CJI के कार्यालय ने सभी आरोपों का खंडन किया और उन्हें ‘पूरी तरह से झूठा और निंदनीय’ बताते हुए खारिज कर दिया था.

20 अप्रैल 2019 को अदालत की जल्दबाजी में बुलाई गई विशेष बैठक, जिसकी अध्यक्षता स्वयं जस्टिस गोगोई ने की थी, में CJI ने दावा किया कि उनके खिलाफ लगे आरोप ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता’ पर हमला और ‘CJI के कार्यालय को निष्क्रिय करने’ की एक ‘बड़ी साजिश’ हैं.

महिला के आरोपों की जांच के लिए शीर्ष अदालत के तीन वरिष्ठ जजों की एक आंतरिक समिति बनाई गई थी. 6 मई 2019 को इस समिति ने CJI को क्लीनचिट देते हुए कहा था कि पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा लगाए गए आरोपों में कोई दम नहीं है.

समिति के इस निर्णय के बाद महिला ने प्रेस रिलीज़  जारी कर कहा था कि वे बेहद निराश और हताश हैं. देश की एक महिला के तौर पर उनके साथ घोर अन्याय हुआ है, साथ ही देश की सर्वोच्च अदालत से न्याय की उनकी उम्मीदें पूरी तरह खत्म हो गई हैं.

जून 2019 में महिला के पति और देवर को दिल्ली पुलिस ने बहाल कर दिया था. इसके बाद जनवरी 2020 में इन महिला कर्मचारी की भी नौकरी बहाल कर दी गई थी.

शिकायतकर्ता को जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट में वापस नौकरी की पेशकश भी की गई थी, लेकिन उन्होंने अपने मानसिक स्वास्थ्य का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया.

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