होम देश क्योंकि टिकी है दुनिया भर की नजरें ग्रीनलैंड के चुनाव पर।

क्योंकि टिकी है दुनिया भर की नजरें ग्रीनलैंड के चुनाव पर।

ग्रीनलैंड की अर्थव्यवस्था मछलियों के कारोबार और डेनमार्क की ओर से मिलने वाली सब्सिडी पर आधारित है।

लेकिन खनन परियोजना को लेकर चल रहा विवाद और पिघलती बर्फ़ न सिर्फ़ मतदान की दिशा बदल सकती है, बल्कि इस क्षेत्र का भविष्य भी इससे बदल सकता है ।

ग्रीनलैंड के दक्षिण में स्थित एक विवादित खनन परियोजना पर असहमति को लेकर सरकार पूरी तरह बँट गई और इसी कारण इस सप्ताह वहाँ अचानक चुनाव कराने पड़े।

क्वेनेफ़ील्ड खदान की स्वामित्व वाली कंपनी का कहना है कि ये खदान अपने एक दुर्लभ खनिज के कारण पश्चिमी दुनिया का सबसे अहम उत्पादक बन सकता है।

यहाँ 17 तत्वों से मिलकर बना एक दुर्लभ खनिज मिलता है, जिसका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स और हथियार बनाने में किया जाता है।

सियुमट (फॉरवर्ड) पार्टी खनन परियोजना का समर्थन करती है. पार्टी का तर्क है कि इससे सैकड़ों लोगों को रोज़गार मिलेगा और कई दशकों तक सालाना करोड़ों डॉलर्स मिलेंगे। इस कारण ग्रीनलैंड को डेनमार्क से और अधिक स्वतंत्रता मिल सकती है।

लेकिन विपत्री इनुइत एटाकाटीगीट (कम्युनिटी ऑफ़ द पीपुल) पार्टी ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है। पार्टी को इस बात की चिंता है कि इस खनन परियोजना से रेडियो एक्टिव प्रदूषण और ज़हरीले कचरे का ख़तरा पैदा हो सकता है।

क्वेनेफ़ील्ड खदान का भविष्य कई देशों के लिए महत्वपूर्ण है। खदान का स्वामित्व एक ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ग्रीनलैंड मिनरल्स के पास है, जिसे एक चीन की कंपनी का समर्थन हासिल है।

हाल के वर्षों में कई बार ग्रीनलैंड ने सुर्ख़ियाँ बटोरी हैं। वर्ष 2019 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका ग्रीनलैंड को ख़रीद सकता है।

डेनमार्क ने इसे बेतुका कहते हुए ख़ारिज कर दिया था। लेकिन ग्रीनलैंड के भविष्य में अंतरराष्ट्रीय हितों की बात आगे भी जारी रही।

ग्रीनलैंड के साथ चीन का खनन का क़रार पहले से ही है। जबकि अमेरिका ने सहायता के रूप में लाखों डॉलर की पेशकश की है। ग्रीनलैंड के थुले में अमेरिका का एक वायुसैनिक अड्डा भी है, जो शीत युद्ध के समय से ही वहाँ है।

डेनमार्क ने भी ग्रीनलैंड की महत्ता स्वीकार की है। वर्ष 2019 में पहली बार डेनमार्क ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा के एजेंडे में ग्रीनलैंड को सबसे ऊपर रखा।

इस साल मार्च में, एक थिंक टैंक ने ये कहा कि ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूज़ीलैंड (जिन्हें फ़ाइव आइज़ भी कहा जाता है) को ग्रीनलैंड पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि वे महत्वपूर्ण खनिज पदार्थों की सप्लाई के लिए चीन पर निर्भरता कम कर सकें।

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